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आ रे चिड़िया
गा रे चिड़िया
ले थोड़ा कुछ खा रे चिड़िया
क्यों इतनी लगती है दुबली ?
क्या बीमार पड़ी थी पगली ?
बहुत दिनों पर आयी है तू
ठहर जरा
मत जा रे चिड़िया
आ रे चिड़िया ...
जो देगी तू पंख सलोने
दे दूँगा मैं सभी खिलौने
वर्षा वन की
नील गगन की
कथा हमें बतला रे चिड़िया
आ रे चिड़िया
गा रे चिड़िया
ले थोड़ा कुछ खा रे चिड़िया
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मंगलवार, 22 मार्च 2011
चिड़िया
गुरुवार, 4 नवंबर 2010
बदरी बाबू
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं
रोते-रोते हँस पड़ते हैं,
हँसते-हँसते रोते हैं।
एक हजरिया क्लर्की करते
बीते अनगिन महीने साल,
कमर झुक गयी, कम दिखती है,
गिर गये सिर के सारे बाल।
सोते-सोते जग पड़ते हैं,
जगते-जगते सोते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !
जोड़-तोड़ में कटता जीवन,
जीवन का बढ़ता जंजाल;
सुबह निकलते उत्तर लाने,
सुबह निकलते उत्तर लाने,
शाम को लाते कई सवाल।
लम्बी-लम्बी आहें भरते,
कभी नहीं कुछ कहते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !
एक जूता, एक धोती-कुर्ता,
चलते रहे एक सी चाल;
बिन ब्याही दो बेटी घर में,
कसता है दु:ख-दर्द का जाल।
सिर पर हाथ, हाथ खाली है,
मर-मर कर सब सहते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010
सपनों की टोकरी
धरी-धरी लुट गयी
सपनों की टोकरी,
मिली नहीं नौकरी।
क्या हम कहें
कुछ कहा नहीं जाए,
जीवन से मौत अच्छी
सहा नहीं जाए।
झूठे अरमान हुए,
सपनें बेइमान हुए,
अपने अनजान हुए
रहा नहीं जाए।
कर गई बाय-बाय
मुम्बई की छोकरी !
मिली नहीं नौकरी।
धरी-धरी लुट गयी ...
कितने जतन किए
पूरी की पढ़ाई,
फिर भी जमाने में
बेकारी हाथ आई।
दर-दर की ठोकर खाते,
पानी पी भूख मिटाते,
पर हम लड़ते ही जाते
जीवन की लड़ाई।
होकर मजबूर यारों
करते हैं जोकरी !
मिली नहीं नौकरी।
धरी-धरी लुट गयी ...
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