कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं
रोते-रोते हँस पड़ते हैं,
हँसते-हँसते रोते हैं।
एक हजरिया क्लर्की करते
बीते अनगिन महीने साल,
कमर झुक गयी, कम दिखती है,
गिर गये सिर के सारे बाल।
सोते-सोते जग पड़ते हैं,
जगते-जगते सोते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !
जोड़-तोड़ में कटता जीवन,
जीवन का बढ़ता जंजाल;
सुबह निकलते उत्तर लाने,
सुबह निकलते उत्तर लाने,
शाम को लाते कई सवाल।
लम्बी-लम्बी आहें भरते,
कभी नहीं कुछ कहते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !
एक जूता, एक धोती-कुर्ता,
चलते रहे एक सी चाल;
बिन ब्याही दो बेटी घर में,
कसता है दु:ख-दर्द का जाल।
सिर पर हाथ, हाथ खाली है,
मर-मर कर सब सहते हैं...
कौन बताए बदरी बाबू
चुप-चुप से क्यों रहते हैं !






