कविता मेरे लिए, मेरे आत्म का, शेष जीवन जगत के स‌ाथ चलनेवाला रचनात्मक स‌ंवाद है। कविता भले शब्दों में बनती हो लेकिन वह स‌ंवाद अंतत: अनुभूति के धरातल पर करती है। इसलिए प्रभाव के स्तर पर कविता चमत्कार की तरह लगती है। इसलिए वह जादू भी है। स‌ौंदर्यपरक, मानवीय, हृदयवान, विवेकशील अनुभूति का अपनत्व भरा जादू। कविता का स‌म्बन्ध मूल रूप स‌े हृदय स‌े जोड़ा जाता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं स‌मझना चाहिए कि उसका बुद्धि स‌े कोई विरोध होता है। बल्कि वहाँ तो बुद्धि और हृदय का स‌ंतुलित स‌मायोजन रहता है; और उस स‌मायोजन स‌े उत्पन्न विवेकवान मानवीय उर्जा के कलात्मक श्रम और श्रृजन की प्रक्रिया में जो फूल खिलते हैं, वह है कविता ... !

शनिवार, 1 जनवरी 2011

नया स‌ाल

                                     
 वह आकर बैठ गया
 जैसे बैठ जाता है कलेजा

 उसके कपड़ों स‌े
 आ रही थी बारूद की गंध
 उसके नंगे पैरों में
 चिपकी थी पतझर की पीली पत्तियाँ
 उसकी आँखों में बचा रह गया था
 बीते स‌ाल के बाढ़ का पानी, कीचड़
 मृतकों की हड्डियाँ, औरतों की चीखें
 और बहुत-सा अंधेरा ...
 अनगिनत रिसते घाव थे उसकी पीठ पर
 खून स‌े तर थे दोनों हाथ

 बंद दरवाजे की
 हिलती स‌ाँकल की तरह
 काबिज था स‌मूचे दृश्य पर उसी का चेहरा

 शहर में
 मेरे घर में
 वह दाखिल हो गया चुपचाप

 खामोशी से रेंगता
 चढ़ गया दीवार के ऊपर
 बींचो-बीच कैलेंडर भर जगह घेर कर
 वह बैठ गया

 जैसे फन काढ़कर
 बैठ जाता है गेहुँअन ...
                                                                              
                                                                        

1 टिप्पणी:

  1. शिल्प की दृष्टि स‌े उच्च-कोटि की कविता बन पड़ी है। यह छोटी स‌ी कविता बहुत भारी है- अर्थ में भी, शिल्प में भी। इसे तो मैंने हंस में पढ़ी थी। कविता के शिल्प पर मैं दंग रह गया था। बहुत-बहुत बधाई।

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